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केदारनाथ की यात्रा जो आपके होश तो उड़ा देगी, लेकिन जोश में कमी नहीं आएगी

केदारनाथ
केदारनाथ

केदारनाथ भाव, प्रकृति और सौंदर्य

आप कभी केदारनाथ गए हैं?  नहीं गए तो जाना जरूर बहुत अच्छी जगह है. एक काम करो, दिवाली से पहले चले जाओ. उसके बाद  29 अक्टूबर को केदारनाथ मंदिर के कपाट बंद हो जाएंगे. इस आर्टिकल में हम आपको केदारनाथ की चढ़ाई के बारे में बताएंगे. वैसे तो घोड़ा-खच्चर हेलिकॉप्टर सब जाता है, लेकिन पैदल यात्रा करने का अलग ही मजा  है. जो आपकी यात्रा को यादगार बनाता है. संसार में जो भी सबसे सुंदर है, वो शिव है. सत्यम शिवम् सुन्दरम. जहां महादेव वास करते हो वो जगह सुंदर न हो ऐसा कैसे हो सकता है. केदारनाथ प्रकृति के बेहद करीब एक पर्यटन स्थल से ज्यादा कहीं एक धार्मिक स्थल है. यहां घूमने और मौज मस्ती करने के अलावा लोग ज्यादातर भक्ति से भावविभोर होकर आते हैं. अब केदारनाथ की बात हो रही है, तो ये भी बतादें कि केदारनाथ धाम उत्तराखंड के रुद्र-प्रयाग ज़िले में  स्थित है. केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग और चार धाम में से एक है.

अद्भुत नजारा

जब आप केदारनाथ जा रहे होते हैं, तो आपको रास्ते में प्रकृति का अद्भुत नज़ारा देखने को मिलता है. ऐसा लगता है, मानो आप प्रकृति की गोद में हैं. केदारनाथ के रास्ते में आपको नदी, पहाड़ झरने, बदलता मौसम सब देखने को मिलेगा. बस नेटवर्क नहीं आएंगे बाकी सब बढ़िया रहेगा.

केदारनाथ चढ़ाई

आपको बतादें कि गौरीकुंड से बाबा भोलेनाथ की चढ़ाई शुरू हो जाती है. लेकिन गौरीकुंड तक पहुंचने के लिए आपको 4 किलो-मीटर पहले लाइन में लग कर जीप लेनी पड़ती है. जो आपको गौरीकुंड उतारती है. गौरीकुंड पहुंचकर आपको चहल-पहल दिखेगी,कोई आपको घोड़े-खच्चर वालों से बात करता  मिलेगा. कोई उन पर अपना सामान लाद रहा होगा.बच्चे ज़ीद कर रहे होंगे कि पापा ये चीज़ दिलवा दो. आप जोश और उमंग के साथ हंसते हुए भोले बाबा का नाम लेकर यात्रा शुरु कर देंगे. हर दो किलोमीटर के बाद दुकानें आती रहेंगी. नूडल्स, चाय, बिस्कुट, बेकरी आइटम, नमकीन पानी सब आपको बड़ी आसानी से मिलेगा.

वहीं गौरीकुंड से जंगलचट्टी 4 किलोमीटर है. उसके बाद आता है रामबाड़ा. फिर अगला पड़ाव पड़ता लिनचोली है, जो गौरीकुंड से 11 किलोमीटर है. बहुत मजेदार यात्रा होती है, कभी धूप निकल जाती है, कभी बारिश हो जाती है. चढ़ाई चढ़ते वक्त घोड़े-खच्चर आते रहते है. 18 किलोमीटर की चढ़ाई में आप आधे वक्त तो उनको साइड देने में ही निकाल देते हैं. उसके बाद लिनचोली से केदारनाथ धाम पहुंचने के लिए यात्रियों को खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है, जो अपने आप में किसी परिक्षा से कम नहीं होती. लेकिन नाचते कूदते महादेव के जयकारे लगाते हुए, भक्त बाबा की चढ़ाई का पूरा आन्नद लेते हुए चढ़ते है. खड़ी चढ़ाई अच्छे-अच्छ खिलाड़ियों के सांस फूला देती है. धैर्य बनाए रखें और भोले बाबा का नाम लेते हुए चढ़ें.

यात्रा से जुड़ा एक किस्सा

इस यात्रा के दौरान हमारे साथ एक दोस्त था हिमांशु एक जगह शिकंजी पीने के लिए रूके ताकि थोड़ी थकान उतर जाए. तभी शिकंजी वाले से 3 गिलास शिंकजी बनवाई. लेकिन वो चढ़ाई के नशे में इतना चूर था कि उसने अपने साथ में रखी हुई किसी ओर की झूठी शिकंजी पी ली. ऐसे-ऐसे किस्से आपके सफर को और ज्यादा खुशनुमा बनाएंगे. कुछ दोस्त आपके घोड़े-खच्चर वालों को देखकर शॉर्टकट मारने की भी कोशिश करेंगे लेकिन उसमें और बुरा हाल हो जाता है. फिर वो दोबारा शॉर्टकट नहीं मारेंगे. आप वापस उतर रहे यात्रियों से ये सवाल करेंगे कि कितना रह गया. तो हर कोई आपको यही कहेगा कि बस आने वाला है और इस आस में और भोले बाबा के प्यार में आप केदारनाथ बाबा की चढ़ाई चढ़ जाएंगे.

मंदिर आने ही वाला है

सबसे अद्भुत नजारा वो होता है, जब केदारनाथ बाबा का मंदिर दूर से नजर आता है. वो सच में आपके हृदय को शीतल कर देने वाला होता, जिसे देखकर भक्तों कि आंखे नम हो जाती है. क्योंकि उन्हीं के दर्शन करने के लिए ही तो वो यहां आए हैं. आप यहां क्यों आए हैं, क्योंकि उन्होंने आपको बुलाया है. मंदिर की चोटी को दो किलोमीटर दूर से देखकर आप अपनी स्पीड तेज कर लेंगे और सीधा भोले बाबा की मिलने की चाहत में आप मंदिर की तरफ बढ़ेंगे.

मंदिर आगया

फिर क्या…मंदिर के समीप पहुंचकर जीवन का सबसे सुखद अहसास होता है. बर्फ की पहाड़ियों से घिरे बाबा केदार ने जितना इंतजार आपको उन तक पहुंचने में करवाया. ये सवाल बाहर नंदी को देखकर और भोले बाबा के मंदिर को देखकर ही गायब हो जाता है. उनके समीप पहुंचकर श्रद्धालुओं की थकान गायब हो जाती है. सिर्फ महादेव से मिलने की चाहत रह जाती है. मंदिर में प्रवेश करते ही आप शिवमय हो जाते हैं, आप शिव में लीन हो जाते है… क्योंकि आपकी आत्मा परमात्मा की बेहद करीब होती है.

इसी के साथ ही ये चढ़ाई खत्म हो जाती है… भोले बाबा अपने भक्त को दर्शन देते है. ना जाने कितनों श्रद्धालुओं की महादेव के सामने जाते ही आंखें नम हो जाती है. जीवन के इस सफर में भक्त की एक यात्रा पूरी हो जाती है.

About the author

Tarun Phore

न मैं आस्तिक... न मैं नास्तिक...बातें करूं मैं Sarcastic...अपनी अलग दुनिया में मस्त... सवाल पूछना अच्छा लगता है, इसलिए नहीं पत्रकार हूं...इसलिए क्योंकि सवाल तुम्हें भेड़चाल से अलग बनाते है...तभी मैं हर मुद्दे पर बेबाक तरीके से तर्क रखता हूं...बाकि जजमेंटल बिल्कुल नहीं हूं...सोच को पनपने का मौका देता हूं..

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