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महाकाल की भस्म आरती नहीं देखी तो कुछ नहीं देखा, जानें क्यों करना पड़ता है महिलाओं को घूंघट

महाकाल
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अकाल मृत्यु वो मरे जो कर्म करे चांडाल का, काल भी उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल का…

अक्सर आपने महाकाल शब्द का उचारण करते हुए लोगों को देखा होगा, या फिर कहीं जाते वक्त गाड़ी के पीछे पढ़ा होगा. मध्य प्रदेश में उज्जैन के पास शाजापुर में एक प्राचीन शिव मंदिर है. इसका निर्माण उज्जैन के महाकाल मंदिर की तर्ज पर किया गया है. इस मंदिर का कई पौराणिक ग्रंथों में काफी सुंदर वर्णन मिलता है. देश-दुनिया से यहां सभी महाकाल यानी भगवान शिव के दर्शन के लिए आते हैं.

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में भक्तों को दक्षिणुमुखी ज्योतिर्लिंग के दर्शन होते है. इन सारी बातों में से एक बात है जो सबसे खास है, वो है भस्म आरती. जिसके लिए महाकाल को जाना जाता है. वैसे तो महाकाल की 5 आरतियां होती हैं, जिसमें भस्म आरती सबसे खास मानी जाती है. भस्म आरती सुबह 4 बजे होती है. पूरे भारत में केवल उज्जैन में आपको ये आरती  देखने का मौका मिलेगा. दरअसल भस्म को सृष्टि का सार माना जाता है, इसलिए प्रभु हमेशा इसे धारण करते हैं.

महाकाल
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आरती से पहले की चहल-पहल

हर सुबह महाकाल की भस्म आरती होती है, जैसे ही आप भस्म आरती के लिए मंदिर की तरफ जा रहे होंगे. आपको मंदिर के बाहर चहल-पहल नज़र आनी शुरु हो जाएगी. कुछ लोग धोती बंधवा रहे होंगे, कुछ जल्दी से लाइन में लगने के लिए भाग रहे होंगे. कुछ महाकाल पर जल चढ़ाने के लिए लौटा ढूंढ रहे होंगे, तो कुछ सोच रहे होंगे कि अंदर फोन कैसे लेकर जाया जाए. ताकि आरती के बाद फोटो खींची जा सके. हर इंसान कुछ ना कुछ कर रहा होगा.

जानकारी के लिए बतादें कि महाकाल के आरती में पुरुष धोती पहनकर और महिलाएं सिर्फ साड़ी में  जा सकती है. सब श्रद्धालु बाबा महाकाल के जयकारे लगाते हुए, मंदिर में प्रवेश करते है. सबसे पहले महादेव को जल चढ़ाया जाता है. जो सिर्फ सुबह के वक्त चढ़ता है.

महाकाल
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ऐसे शुरू हुई भस्म आरती की परंपरा

पौराणिक कथाओं के मुताबिक प्राचीन काल में दूषण नाम के एक राक्षस की वजह से पूरी उज्‍जैन नगरी में हाहाकार मचा था. नगरवासियों को इस राक्षस से मुक्ति दिलाने के लिए महादेव ने उसका वध किया था. फिर गांव वाले भोले बाबा से यहीं बस जाने का आग्रह करने लगे. तब से भगवान शिव महाकाल के रूप में वहां बस गए.

राक्षस की राख से श्रृंगार

महादेव ने दूषण को भस्‍म किया और फिर उसकी राख से अपना श्रृंगार किया. इसी वजह से इस मंदिर का नाम महाकालेश्‍वर रखा गया और शिवलिंग की भस्‍म से आरती की जाने लगी.

भस्म आरती के नियम

महाकाल की भस्म आरती के दुर्लभ पलों का साक्षी बनने का ऐसा सुनहरा मौका कहीं नहीं प्राप्त होता. ऐसा कहा जाता है कि जो मनुष्य आरती में शामिल हो जाए, उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं. बता दें,  भस्म को पूरी विधि विधान के साथ बनाया जाता है. सबसे पहले कपिला गाय के कंडे,  पीपल, पलाश, शमी और बेर के लकड़ियों को साथ में जलाया जाता है. इनको जलाते समय वहां के पुजारी मंत्रोच्चार भी करते हैं. फिर उस भस्म को कपड़े के माध्यम से छान लिया जाता है और उसे महादेव पर अर्पित किया जाता है. महाकालेश्र्वर में शमशान में जलाई पहली चिता की राख से भी भगवान भोले का श्रृंगार किया जाता है.

महिलाओं के लिए नियम

महाकालेश्र्वर में भस्म आरती के समय महिलाओं का जाना वर्जित है. लेकिन जो भी महिलाएं उस वक्त वहां मौजूद होती हैं, उन्हें साड़ी पहनना जरूरी होता है. इसके अलावा जिस वक्त शिवलिंग पर भस्म अर्पित की जाती है, वहां खड़ी सभी महिलाओं को अपना चेहरा घूंघट से ढक लेना चाहिए. ऐसा कहा जाता है उस समय महादेव निराकार रूप में होते हैं.

भस्म आरती शुरू

भस्म आरती शुरू होती है, महाकाल के पास सिर्फ पुजारी होते है. सारे भक्त आरती को स्क्रीन पर देख सकते हैं. बाहर पूरा हॉल भरा होता है. अगर आप पहली बार गए है, तो आपको इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं होता कि आगे क्या होने वाला है. क्योंकि आपके लिए सब वैसा ही चल रहा होता है, जैसे कि और आरतियों में आपने देखा होगा.

भस्म आरती के दौरान सबसे पहले महादेव का स्नान होता है, उनका श्रृंगार होता है. आप ये सब बहुत अच्छे से देख रहे होते हैं. कुछ लोग जल्दी उठे होते हैं, तो उन्हें उबासी आने लगती है. तभी होती है, महाकेलश्वर मंदिर में महाकाल की भस्म आरती की शुरुआत. ज्योतिर्लिंग को सामने से सूती वस्त्र से ढका जाता है, भस्म से भरी पोटली पूरे शिवलिंग पर घुमाई जाती है. पूरा शिवलिंग और हवा में सिर्फ भस्म होती है. पुजारी शिवलिंग के आस-पास भस्म से महादेव की आरती करता है और पीछे आराम-आराम से मंत्रों का उचारण चल रहा होता है. मंदिर में आपको सिर्फ भस्म उड़ती नजर आएगी. सिर्फ भस्म… फिर ये देखने के बाद लोगों के दिमाग में आता है, शायद यही थी भस्म आरती. नहीं इतना ही नहीं, महाकाल की आरती इतने में नहीं सिमटती. अभी तो असली रूप आना बाकी है. भस्म के बाद कपड़ा हटा दिया जाता है. फिर पुजारी महाकाल की आरती शुरु करते है. वो कर रहे होते है. उस वक्त तक सब भक्तों की नींद भी भाग चुकी होती है. सभी का ध्यान आरती में लगने लग जाता है. लेकिन…लेकिन…

उसके बाद एक ध्वनि सुनाई देती है. महाकाल के मंदिर की लाइट बंद हो जाती है, फिर आरती की रोशनी में महाकाल के भव्य स्वरूप के दर्शन होते है. हर दीवार, हर स्तंभ, हर जगह शिवमय हो जाती है. आत्मा मानो जाकर परमात्मा के चरणों में बैठ गई हो, वो कह रही हो सृष्टि में अगर कहीं स्वर्ग है, तो वो महाकाल के चरणों में है. आरती देख ऐसा महसूस होता है कि सभी देवी देवता आकाश में आकर खड़े हो गए हो और महादेव की स्तुति गा रहे हो…पूरा मंदिर महाकाल की आवाज से गूंज उठता है. हर तरफ सिर्फ महाकाल की गूंज होती है. आरती में बैठा हर इंसान अपने आपको भाग्यशाली महसूस करता है, कि उसने परमात्मा का दिव्य स्वरूप के दर्शन किए. क्योंकि उस दौरान ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान शिव वहां खुद विराजमान है और भक्तों को देख रहे हैं. दूर-दूर से आए भक्त महादेव के चरणों में अपने मन का हाल सुना रहा है. भक्तों के रोंगटे खड़े हो जाते है, महाकाल का रूप और अधिक प्रचंड हो जाता है. उनके इस स्वरूप के दर्शन कर के अच्छों-अच्छों का हृदय धड़क जाता है. सभी भक्त महादेव के समीप हाथ जोड़े बैठे हैं. बहुत कुछ है कहने को लेकिन वो बस उनके उस स्वरूप को अपने मन में बसा लेना चाहता है. वो सारे बंधनों, मोह-माया से दूर महाकाल के चरणों में समर्पित है. ऐसा प्रतीत होता है कि वहां मौजूद भक्तों ने अपने आपको त्याग दिया, खुद को महाकाल को सौंप दिया. क्योंकि महाकाल ही उनकी पीड़ा को दूर करेंगे. आरती हो रही है. पूरा मंदिर में ध्वनि सुनाई दे रही है. हर भक्त की आंखों में महाकाल के लिए स्नेह और प्रेम है. महाकाल ने भी अपने भव्य रूप में आकर भक्तों पर कृपा बरसा रहे है.

महाकाल
महाकाल

इसी स्नेह और प्रेम की ज्योति के साथ इंसान महाकाल के दर्शन पा लेता है. भस्म आरती, समाप्त हो जाती है. भक्त आशा और भक्ति का दीपक जलाकर, मंदिर से बाहर आ जाता है. वो इन्हीं यादों को माला में पिरोकर अपने अगले सफर के लिए निकल जाता है, और वो डमरू वाला भी हंसते-हंसते उसे जाने की इजाजत देता है, कि मैं हर स्वरूप में तुम्हारे साथ हूं. मैं संसार का नाथ हूं.

About the author

Tarun Phore

न मैं आस्तिक... न मैं नास्तिक...बातें करूं मैं Sarcastic...अपनी अलग दुनिया में मस्त... सवाल पूछना अच्छा लगता है, इसलिए नहीं पत्रकार हूं...इसलिए क्योंकि सवाल तुम्हें भेड़चाल से अलग बनाते है...तभी मैं हर मुद्दे पर बेबाक तरीके से तर्क रखता हूं...बाकि जजमेंटल बिल्कुल नहीं हूं...सोच को दबाता नहीं बल्कि उठाता हूं.

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