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सुषमा का दम जो करता था सबकी बोलती बंद, प्रखर वक्ता और कुशल नेता का ऐसा रहा सफर

Sushma swaraj
Sushma swaraj

पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का 67 साल की उम्र में निधन हो गया. मंगलवार को उन्हें दिल का दौरा पड़ा था. वहीं 2016 में एम्स में उनकी किडनी ट्रांसप्लांट की गई थीं, इसके बाद भी उनकी तबीयत लगातार खराब रहती थी. इसलिए उन्होंने 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ने से मना कर दिया था. सुषमा के अचानक निधऩ की खबर से देश सदमे में है.

संसद हो या चुनावी अभियान या फिर कोई अंतरराष्ट्रीय मंच सुषमा स्वराज अपने जोरदार सटीक भाषण के लिए जानी जाती थी. जब वे संसद में खड़ी होकर बोलती था, तो पूरा संसद तालियों से गूंज उठता था.विपक्षी दल भी उनके भाषण के मुरीद थे. वे अपने कटाक्ष और व्यंग से अच्छे-अच्छे दिग्गज नेताओं की बोलती बंद कर देती थी. उनमें सेंस ऑफ ह्यूमर गजब का था. अक्सर वो गंभीर माहौल में भी चुटकी लेकर उसे हल्का कर देती थी. उनके पास शेरो-शायरी का भी खजाना था. आतंकवाद के खिलाफ UNO  के मंच पर सुषमा ने पाकिस्तान को ऐसे घेरा था कि पाकिस्तान के अंदर खलबली मच गई थी.

बीजेपी वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज का व्यक्तित्व बेहद शानदार था. 25 साल की उम्र में मंत्री बनने वाली सुषमा स्वराज ने अपनी राजनीति करियर में कई रिकॉर्ड्स कायम किए.

आइए आपको बताते है, उनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ खास बातों के बारें में

 – सुषमा स्वराज का जन्म 14 फरवरी 1952 को हरियाणा के अंबाला कैंट में हुआ था.

– उनके पिता हरदेव शर्मा RSS के प्रमुख सदस्य थे.

–  अंबाला कैंट के सनातन धर्म कॉलेज से उन्होंने संस्कृत और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई की. इसके बाद उन्होंने चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की. महज 21 साल की उम्र में सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू कर दी.

– सुषमा ने अपने राजनीति की शुरुआत 1970 में की थी. उनकी छात्र राजनीति जीवन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ शुरू हुआ. कई आंदोलनों में भी हिस्सा लिया. जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया.

– 25 साल की उम्र में वे हरियाणा विधानसभा में चुनकर पहुंची थी. 1977 में वे देवी लाल की जनता पार्टी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनीं. इसके बाद वे 1987 से 1990 तक हरियाणा की शिक्षा मंत्री भी रहीं. वहीं 27 साल की उम्र में सुषमा स्वराज को जनता पार्टी (हरियाणा) का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया.

– फिर क्या था, सुषमा स्वराज ने अप्रैल 1990 को राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखा. उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाया गया. वहीं इसके बाद 1996 में वे दक्षिणी दिल्ली क्षेत्र से सांसद चुनी गईं. उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनाया गया. अक्टूबर 1998 में उन्हें केंद्रीय कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया और दिल्ली की पहली महिला सीएम बनीं. लेकिन बढ़ती महंगाई के कारण बीजेपी विधानसभा चुनाव हार गई और सुषमा स्वराज ने दूबारा राष्ट्रीय राजनीति में वापसी कर ली.

– सिंतबर 1999 में बीजेपी ने सुषमा को तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ कर्नाटक के बेल्लारी सीट से चुनावी मैदान में उतारा. इस दौरान उन्होंने कन्नड़ भाषा में चुनाव प्रचार संबोधित किया. उनको कन्नड़ में बोलता देख अटल बिहारी वाजपेयी भी हैरान हो गए थे. इस चुनाव में सुषमा स्वराज को सिर्फ 12 दिनों के भीतर प्रचार में 358000 वोट मिले. लेकिन वो सोनिया गांधी से महज 7 प्रतिशत वोटों से हार गईं थी.

– 2014 नरेंद्र मोदी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया. पीएम मोदी की विदेश नीति को लागू कराने में उनकी अहम भूमिका रही. उनके UNO के भाषण की काफी तारीफ हुई थी.

– सुषमा स्वराज 7 बार सांसद और 3 बार विधायक रहीं.

सुषमा स्वराज ने हमेशा लंबे राजनीतिक करियर में यही सिखाया कि कहीं कोई शार्टकट नहीं होता. जिस भी मुकाम पर पहुंचना हो उसके लिए मेहनत करनी होती है. चाहे वो दिल्ली की सीएम रही हों या फिर अटल बिहारी वाजेपयी सरकार में मंत्री या एनडीए-1 में विदेश मंत्री, उनके बारे में हमेशा कहा जाता था कि वो लंबे समय तक ऑफिस में रहती थीं. अपना होमवर्क बहुत बारीकी से करती थीं.

जिसने भी विदेश मंत्री के रूप में उन्हें देखा और उनके काम को देखा है, वो हर शख्स कहता है कि अगर वो कभी उनके पास काम के लिए गया है तो वो उस पर तुरंत कार्रवाई करती थीं. ट्विटर पर जो भी शख्स मैसेज भेजता था, वो चाहे देश का नागरिक हो या फिर विदेश का उस पर वो तुरंत हरकत में आती थीं. जवाब भी देती थीं और आवश्यक कार्रवाई भी करती थीं.

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देश के लिए सुषमा स्वराज ने जो किया. इसके लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा.

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