Gathered Humour

लाइफ के सारे गोल मंडे के लिए ही क्यों सेट होते है, क्या आप भी सोचते हैं, ये सोमवार क्यों आता है ?

हमारे लाइफ में मंडे का बहुत महत्व है. मंडे न होता तो उन बेचारों का क्या होता, जो अपने लाइफ के गोल मंडे के लिए सेट करते हैं. सबसे बड़ी विडम्बना ये ही कि मंडे कभी आता ही नहीं है. उदाहरण के तौर पर अगर आप विचार करें कि जिम शुरू करते हैं, तो आपके जह्न में आएगा कि मंडे से शुरू करता हूं. वहीं अगर आप डाइटिंग का सोच रहे हैं, तो आप सोचेंगे कि आज-आज खा लेता हूं, डाइटिंग मंडे से करूंगा. अगर आपको कुछ जरूरी काम भी करना है, तो आप उसे भी मंडे के लिए टाल देते हैं. जीवन में कोई भी काम सोच लीजिए वो काम कभी नहीं होता, होगा तो सिर्फ मंडे को ही.

इन सबके बीच सोचते सोचते मंडे बड़ी जल्दी आ जाता है. वो दिन होता है, जो आपने फैसला किया था, कि आज से ये करूंगा, लेकिन ऐसा नहीं होता. ब्लडी मंडे हफ्ते का और आपके शारीरिक-मानसिक ‘दमन-चक्र’ का पहला दिन होता है. फिर आप सोचते हैं कि छोड़ो यार थोड़े दिन और ज़िंदगी जी लो, फिर तो मैं ये कर ही लूंगा, लेकिन कितने मंडे इसी सोच में ही निकल जाते है. आप वाला मंडे नहीं आता.

दूसरी ओर परेशानी उन ऑफिस वाले लोगों के लिए जो शनिवार-रविवार की छुट्टी मनाकर ऑफिस जाते है. कोई दूसरा चारा है नहीं, नौकरी है भाई वो तो करनी पड़ेगी. यही तो वजह है कि शुक्रवार आते-आते हम थका हुआ महसूस करते हैं और वीकएंड, वो तो आबे-ज़म ज़म सा लगता है, यानि बेहद राहत भरा. आप पूरा हफ्ता अपनी छुट्टी के इंतजार में निकाल देते हैं. मगर फिर क्या बहुत राहत की सांस ले ली. चलो वापस यानि ब्लडी मंडे. जो किसी विलेन से कम नहीं दिखता. जो हीरो को खुश रहने नहीं देता. जो एकता कपूर के नाटक जैसा है, जो परेशानियां लेकर हमारे सिर पर सवार रहता है. फिर से मंडे हमें उसी दुनिया में ले जाता है काम और थकान की उसी चक्की में दोबारा पीसने के लिए.

फिर आप ऑफिस जाते वक्त सोचते हैं, लाइफ में वैसे ही इतनी मुश्किलें कम थी. जो भगवान ने ये मंडे बना दिया. क्योंकि सुबह उठते ही हमारे दिमाग में ख्याल आता है कि हम जॉब ही क्यों कर रहे हैं. आधी नींद में लोग ऑफिस सोचते हुए जाते है कि वीकेंड को उन्होंने ऐसे बर्बाद कर दिया.

सोमवार को ऐसा लगता है, मानो सारी दुनिया घर से निकल गई हो. मेट्रो, बस, सड़क हर तरफ भीड़-भाड़ शोर शराबा. ऑफिस जाते वक्त आप झलाहट का अनुभव करते हो. अरे यार कहां फस गया जैसे विचार आते है.

लेकिन कुछ भी कहो, इसी विचार के साथ आप आगे बढ़ते जाते हो. जिंदगी जीते चले जाते हो. क्योंकि आज मंडे है, तो एक दिन संडे भी जरूर आएगा.

About the author

Tarun Phore

न मैं आस्तिक... न मैं नास्तिक...बातें करूं मैं Sarcastic...अपनी अलग दुनिया में मस्त... सवाल पूछना अच्छा लगता है, इसलिए नहीं पत्रकार हूं...इसलिए क्योंकि सवाल तुम्हें भेड़चाल से अलग बनाते है...तभी मैं हर मुद्दे पर बेबाक तरीके से तर्क रखता हूं...बाकि जजमेंटल बिल्कुल नहीं हूं...सोच को दबाता नहीं बल्कि उठाता हूं.

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