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क्यों हैं तीन तलाक एक बड़ा मसला ?

एक बार में तीन बार तलाक−तलाक−तलाक कह कर किसी महिला की जिंदगी बर्बाद कर देने की 14 सौ साल पुरानी कुप्रथा अब इतिहास के पन्नों में सिमट गई है. तीन तलाक लंबे समय से मुस्लिम महिलाओं की सिर पर तलवार की तरह लटका रहा था. लेकिन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अब तीन तलाक बिल को मंजूरी दे दी है. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद अब तीन तलाक कानून बन गया. बतादें कि ये कानून 19 सितंबर से लागू माना जाएगा. तीन दिन पहले लोकसभा के बाद राज्यसभा से भी तीन तलाक बिल पास हो गया था. बिल के पक्ष में 99 और विपक्ष में 84 वोट पड़े.

आइए आपको बताते हैं, तीन तलाक बिल के प्रावधान

– तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को रद्द और गैर कानूनी बनाना.

– बिल में तीन साल की सजा का प्रावधान रखा गया है.

– तीन तलाक को संज्ञेय अपराध मानने का प्रावधान, यानी पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है.

– तीन तलाक देने पर पत्नी खुद या फिर उसके रिश्तेदार ही इस बारे में केस दर्ज करा सकेंगे.

– पड़ोसी या कोई अनजान शख्स इस मामले में केस दर्ज नहीं करवा सकता.

– ये कानून जम्मू-कशमीर को छोड़कर पूरे देश में लागू होगा.

– मौखिक या लिखित किसी भी तरीके से पति अगर एक बार अपनी पत्नी को तलाक देता है, तो वे अपराध की श्रेणी में आएगा.

– तीन तलाक देने पर पति को तीन साल की कैद और जुर्माना दोनों हो सकता है. जिसके बाद उसे जमानत मजिस्ट्रेट कोर्ट से ही मिलेगी.

– पीड़ित महिला का पक्ष सुने बगैर, मजिस्ट्रेट तीन तलाक देने वाले पति को जमानत नहीं दे पाएंगे.

– मजिस्ट्रेट के पास सुलह करवाकर शादी बरकरार रखने का अधिकार है.

– तीन तलाक देने पर पत्नी, पति से गुजारा भत्ते का दावा कर सकती है. इसकी रकम मजिस्ट्रेट तय करेगा. जो पति को देना होगा.

– तीन तलाक पर बने कानून में छोटे बच्चों की निगरानी और रखवाली मां के पास रहेगी.

मुस्लिम महिलाएं इससे काफी प्रताड़ित थी. काफी समय से वे तीन तलाक के खिलाफ लड़ रही थीं. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट महिलाओं के साथ आया और इसे खारिज कर दिया. अब कोई कितनी बार भी तलाक कहे लेकिन तलाक नहीं होगा.

जानकारी के मुताबिक तीन तलाक की व्यवस्था क़ुरान की हिदायतों के विपरीत और ग़ैर-इस्लामी है. दरअसल, क़ुरान ने समाज में स्त्रियों की गरिमा, सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बहुत सारे प्रावधान किए हैं. वहीं तलाक के मामले में भी इतनी बंदिशें लगाईं गई हैं कि अपनी बीवी को तलाक देने के पहले मर्दों को सौ बार सोचना पड़े. कुरान में तलाक को न करने लायक काम बताते हुए इसकी प्रक्रिया को कठिन बनाया गया है, जिसमें रिश्ते को बचाने की आख़िरी दम तक कोशिश, पति-पत्नी के बीच संवाद, दोनों के परिवारों के बीच बातचीत और सुलह की कोशिशें और तलाक की इस पूरी प्रक्रिया को एक समय-सीमा में बांधना शामिल हैं.

आपको जानकर हैरानी होगी पाकिस्तान, बांग्लादेश और मोरक्को जैसे देशों में तलाक अदालतों से होते हैं लेकिन हमारे जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश में ये अभी तक चल रहा था.

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